लंड बुढापे की लाठी और हज्जाम की बिटिया

अभी  बाबा बूदन को बुढापे का सुरुर चढ रहा था, बुढिया की चूत सूख के छुहारा हो गयी थी और नयी लौंडिया ढलती जवानी को आग नहीं दिखातीं। रोज सुबेरे चौराहे पर जाकर स्कूल जाती लड़कियों को चोदने के लिए ललचाती नजरों से देखते और फिर कोई हिंट न मिलने से उदास होकर धोती में लटकता लंड लेकर वापस चले आते। बुढौती का सहारा डंडा अब खड़ा नहीं होता है। तो क्या हुआ, मन तो चंचल है और बच्चा भी, इसका बुढापा नहीं आता और इस कदर से बुढापे में लौड़ा की छीछालेदर होने से बचाने के लिए कोई ना कोई उपाय तो करना ही पड़ेगा।

उम्र कोई साठ साल की थी, पर लंड की जवानी ज्यों की त्यों थी। बाबा बूदन ने आज तक अपने लौड़ा को कभी भी सरका, मूठ मारना या हस्त्मैथुन जैसी बुरी आदतों को उन्होंने अपने पास नहीं फटकने दिया था। इस तरह से बाबा बूदन के लौड़े पर बुढापे का जरा सा भी असर नहीं दिखता था। वो एकदम तन बदन और मन तीनों से जवान थे। पर उनको एक मौका मिलता अगर किसी जवान कमसिन कन्या के सामने अपने जवानी को साबित करने का तो वो पक्का इसे चुटकी बजाते ही साबित कर देते। इस प्रकार से यह मौका कब आने वाला था इसे वो बेसब्री से इंतजार कर रहे थे। बाय द वे, वो अपना कर्म कर रहे थे और फल के रुप में चूत की इच्छा जाहिर कर रहे थे।

अक्सर वो इस दोहे को रटते मिलते – उपर वाले कुछ तो छूट कर, लंड के आगे चूत कर। इस तरह से सुबह सुबह दंड पेल कर जब वो तेल मालिश करते तो अपने लौड़ा पर सांडे का तेल लगाकर धूप में सेंकना न भूलते। यही कारण था कि उनका लंड सीसे की मानिंद चमक रहा था।लेकिन उनका भाग्य तब खुला जब कि वो अपनी नाउन, नाउन तो जानते होंगे आप, हज्जाम की बीबी को नाउन कहते हैं गांव देहात में।

नाउन अपना जजमानी वसूलने आयी थी, उसका नाम था कलावती, कलावती की बेटी लीला थी। उमर मुश्किलन अठारह, लेकिन जवानी किसी कचनार के फूल की मानिंद खिली हुई, उसकी चूंचियां चौंतीस की अभी ही थीं, कमर अठाइस और गांड छत्तीस। आह्ह ! देखते ही बाबा बूदन का बलब फ्यूज हो गया। लौड़ा को धोती के अंदर कंट्रोल करते हुए बायें हाथ से पकड़ कर उन्होंने धोती के फेंटे में बांधा और बोले – “ क्या कलावती, बहुत दिन बाद आयी है, कहां रहती है, जजमानी वसूलने के समय ही हमारी याद आती है क्या?” कलावती मुस्करा के बोली, – तू बुड्ढे को बुढापे में भी ईशक का रोग लग जाता है का? अभी सुधर जा नहीं तो बूढिया से बोल दूंगी।

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बूदन बुड्ढे ने हार न मानी और आज पाकेट से पांच सौ का नोट निकाल कर कलावती के हाथ में देते हुए बोला, ये ले और आज हमारे यहां बुढिया की तबियत ठीक नहीं है, यहीं रह जा और खाना बनाके खिलाके सुबह जाना। नाउन समझ गयी कि बुड्ढे की नजर मेरी बेटी पर है, सो पल्ट के बोली नहीं मुझे बहुत काम है। इस पर बूदन बुड्ढे ने एक पांच सौ का नोट और निकाला और उसे पकड़ाते हुए कहा कि इस बार तो रुक जा जानेमन।

कलावती ने कहा, “ जो तू चाहता है वो होगा नहीं, मेरी बेटी की अभी नथ भी नहीं उतरी है, अभी तो वो कच्ची कली है, उसे मरदों की आदत नहीं तू उसे छुएगा तो सीधा जेल जाएगा” मैं रुक जाती हूं! और वो रुक गयी। रात को अतिथि घर में दोनों मां बेटी रुकीं। लीला भी अपने मां के साथ में खाना बनाने के लिए किचेन में चली गयी और फिर दोनों मां बेटी खाना बनाने लगीं। जब वो पानी भरने के लिए कुंए के पास गयी तो बूदन ने वहीं दबोच लिया उसे। बोला ये ले दो हजार रुपये रानी और तुम्हारे लिए सोने की नथ बनाके रखी है और उसने पाकेट से जगमगाती नथ निकाल के उसके हाथों पर रख दिया। लीला लाजवाब हो गयी और फिर उसने अपने आप को घुप्प अंधेरे में बूदन को सौंप दिया। बूदन ने कुंए की जगत पर ही लीला के हुस्न का रस लेना शुरु किया।

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किसी के आने की कोई भी गुंजाईश नहीं थी और इसलिए उसे कोई डर नहीं था। उसने अपनी धोती खोल कर मोटा लंड लीला के सामने रख दिया। लीला ने लौड़ा तो बहुत देखे थे मूतते लोगों के लेकिन ये पीस लाजवाब थी। उसने बूदन के लंड को पक्ड़ कर किसी खिलौने की तरह खेलना शुरु किया पर ये क्या, वो तो देखते ही देखते लोहे की राड की तरह कठोर हो गया। पल में माशा पल में शोला, लंड को कड़ा होते देखते ही बूदन ने लीला की चोली के एक एक बटन खोलने शुरु किये। पहला बटन खोलते ही उसकी चूंचियां बाहर आने के लिए कबूतरों की तरह फड़फड़ाने लगीं। जैसे ही उसने दूसरा बटन खोला, उसकी पूरी चूंचि बाकी के दो बट्नों को तोड़ती हुई उसके दोनों हाथों में। गुदाज जिस्म के इन ह्सीन अवयवों को पकड़कर अंधेरे में टटोलते हुए उसने लीला का पेटी कोट सरका दिया। अब वो कुंए की जगत पर नंगी खड़ी थी।

बुड्ढे ने जवान हसीना के कमसिन चूत को टटोलना शुरु किया। थी तो वो हज्जाम की बेटी लेकिन उसके झांटों पर कभी भी छूरा न चला था, उलझी झांटों के बीच चमकती चिकनी चूत ने बुड्ढे को अंधा कर दिया। अंधेरे में कामुक बुड्ढा अंधा हुआ लंड को पकड़ कर उसकी झांटों पर रगड़ने लगा। वो पागल होने लगी थी, इतना ज्यादा कि उसने उसे बिना कुछ कहे ही उसका लौड़ा पकड़ कर अपनी चूत के छेद पर रख दिया। इस प्रकार से लंड के रास्ता पाते ही बुड्ढे ने लीला की पतली कमर को पकड़ कर अपनी तरफ भींचा और भचाक से आवाज करते हुए उसका कठोर मोटा लंड पिस्टन की तरह चूत के अंदर चला गया।

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लीला की चीख निकले इससे पहले उसने अपना हाथ अपने मुह पर रख लिया था। अब लीला ने बुड्ढे का साथ देना शुरु किया। दोनों ही कामान्ध हो चुके थे और चुदासे भी। इस प्रकार से जैसे जैसे रात गहराती गयी, वासना का उफान बढता गया और आखिर कार उसने अपना वीर्य उसकी चूत में छोड़ ही दिया। चूत से बहते वीर्य को उसकी टांगों के बीच बैठ कर बुड्ढे ने खुद चाटा और अपने वीर्य के नमकीन पने को महसूस किया। ये एक अलग अनुभव था और उसके लिए वो कुछ भी करने को तैयार था। नाउन की बेटी लीला को चोद कर उसका लंड और भी जवान हो गया था।

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